कोरबा में ‘मौत का टॉवर’! घटिया निर्माण से खेली जा रही मजदूरों की जान
20 लाख का खेल, ज़मीन पर ‘झोल’,सीढ़ी टूटी, मजदूर गिरा—कौन जिम्मेदार?

कोरबा। कोरबा वनमंडल में बन रहा एक वॉच टॉवर अब भ्रष्टाचार और लापरवाही की खौफनाक मिसाल बनता जा रहा है। ग्राम भुलसीडीह के जांच नाका के पास खड़ा यह तीन मंजिला ढांचा सुरक्षा नहीं, बल्कि खतरे का टावर साबित हो रहा है।
20 लाख का खेल, ज़मीन पर ‘झोल’

कैम्पा मद से करीब 20 लाख रुपये का यह प्रोजेक्ट 2022-23 में स्वीकृत हुआ था, जिसे मार्च 2025 तक पूरा होना था। लेकिन हकीकत यह है कि टॉवर आज भी अधूरा खड़ा है—और चौंकाने वाली बात यह कि कागजों में इसे लगभग पूरा दिखाकर भुगतान तक निकाल लिया गया।
10 एमएम सरिया पर खड़ा तीन मंजिला ढांचा!

तकनीकी मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं। जहां 16-20 एमएम के मजबूत सरियों की जरूरत होती है, वहां 8-10 एमएम के कमजोर सरिए लगाकर पूरी संरचना खड़ी कर दी गई। कॉलम से लेकर सीढ़ी और नींव तक—हर जगह घटियापन साफ नजर आ रहा है। टॉवर में दरारें पड़नी शुरू हो चुकी हैं।
सीढ़ी टूटी, मजदूर गिरा—कौन जिम्मेदार?

26 फरवरी 2026 को घटिया निर्माण की सच्चाई उस वक्त सामने आ गई जब कमजोर सीढ़ी टूटने से एक मजदूर करीब 20 फीट नीचे जा गिरा। गंभीर रूप से घायल मजदूर की हालत ने इस “भ्रष्टाचार के ढांचे” की पोल खोल दी।
अफसर मौन, रेंजर पर मेहरबानी?
नियमों के मुताबिक एसडीओ और डीएफओ को निर्माण की निगरानी करनी थी, लेकिन आरोप है कि सब कुछ “ओके” बताकर आंखें मूंद ली गईं। सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ लापरवाही है या मिलीभगत?
‘लेप्स’ से बचाने के नाम पर भुगतान का खेल
सूत्र बताते हैं कि वित्तीय वर्ष खत्म होने से पहले राशि बचाने के नाम पर अधूरे काम को पूरा दिखाकर भुगतान निकाल लिया गया। इस वॉच टॉवर में भी वही पैटर्न नजर आ रहा है।
रेंजर का बचाव
इस मामले में रेंजर मृत्युंजय शर्मा का कहना है कि कार्य पूर्ण कराया जा रहा है और अभी इस कार्य की राशि पूर्ण रूप से आहरित नहीं हुई है। कार्य की गुणवत्ताहीनता से उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि पूरा कार्य गुणवत्ता के आधार पर हो रहा है। हादसे के बारे में कहा कि प्रारंभिक तौर पर जो उनका दायित्व था,उसे उन्होंने पूरा किया है।
सवाल सीधा है:
क्या इस “मौत के टॉवर” पर कार्रवाई होगी या फिर फाइलों में ही सब कुछ दफन कर दिया जाएगा?









